चलो एक बार
फिर से।
प्रेम की एक नई शुरुआत।
और ख़ुद तक लौटने का एक सफ़र।
बार फिर से
प्रेम से आगे,
पहचान की ओर।
रिश्तों को एक बारफिर से देखने का नज़रिया।
‘चलो एक बार फिर से’ सिर्फ़ आरजे धीर और राधिका की प्रेम कहानी नहीं है। यह उपन्यास इन दोनों पात्रों के न सिर्फ़ प्रेम को एक नए रूप में देखता है बल्कि हमें ख़ुद को, अपने रिश्तों और अपने अस्तित्व, अपनी पहचान को नए रूप में देखने का नजरिया देता है।
यह उपन्यास सवाल करता है कि क्या बिछड़े प्रेमी जीवन के किसी और मोड़ पर मिलकर ‘प्रेम की मौन उपस्थिति’ के साथ रह सकते हैं? यह उपन्यास धीर और उसके कोर्टमार्शल हुए सूबेदार पिता के बनते बिगड़ते रिश्तों के बीच पुरुष और उसके अहं को फिर से देखने का मौक़ा देता है।
उपन्यास की नायिका राधिका प्रेम और अपनी एक स्वतंत्र पहचान के लिए लड़ रही है। वहीं कहानी की अन्य पात्र सुहानी और प्रज्ञा समाज और कॉर्पोरेट में मजबूती से कदम जमाती लड़कियों के लिए प्रेरणा हैं।
क्या बिछड़े प्रेमी जीवन के किसी और मोड़ पर मिलकर ‘प्रेम की मौन उपस्थिति’ के साथ रह सकते हैं?
एक सवाल, जो कहानी के साथ चलता है।कुछ लोग, जो साथ रह जाते हैं।
हर किरदार की अपनी तलाश।
धीर
डीबी उर्फ़ धीर भारत के उस मध्यमवर्गीय किशोर-युवा का प्रतिनिधि है, जिसके भीतर ज़िंदगी में कुछ बड़ा करने की बेचैनी तो है, लेकिन उसे यह नहीं पता कि जाना कहाँ है। शरारतों और बेफ़िक्री के बीच एक दिन उसे शर्मीली राधिका से प्यार हो जाता है। यह उसका पहला प्यार है और शायद पहली ऐसी चीज़ भी, जिसे वह खोना नहीं चाहता। लेकिन अपने डर और झिझक के कारण वह न राधिका से अपने दिल की बात कह पाता है, न अपने भविष्य को लेकर कोई फ़ैसला।
एक आदमी है जिससे वह सबसे ज़्यादा नफ़रत करता है—उसका पिता।
कॉलेज का डीबी ज़िंदगी के संघर्षों से लड़ते हुए आरजे धीर बन जाता है। वह अपनी पहचान बना लेता है, लेकिन राधिका को खो देता है।
बरसों बाद जब धीर और राधिका फिर मिलते हैं, तब तक दोनों बहुत बदल चुके हैं। क्या बिछड़ा हुआ प्यार अपनी पुरानी यादों से निकलकर फिर कोई नया रंग खिलेगा?
चलो एक बार फिर से · कहानी के पात्रराधिका
राधिका एक बेहद अमीर परिवार में जन्मी शर्मीली लड़की है, जिसके अपने ख़्वाब हैं और अपनी पहचान बनाने की चाहत भी। लेकिन उसके परिवार की दुनिया में बेटी के लिए रास्ता पहले से तय है—बीस साल की उम्र तक शादी और फिर परिवार।
धीर से प्यार उसे अपनी दुनिया से बाहर निकलने का साहस तो देता है, लेकिन परिस्थितियाँ दोनों को अलग कर देती हैं। बरसों बाद धीर से दोबारा मिलना राधिका को उसकी अपनी भूली हुई पहचान से मिलाता है। उसे याद आता है कि वह सिर्फ़ किसी की पत्नी और माँ नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं और सपनों वाली राधिका भी है।
अब उसके सामने प्यार, परिवार और अपनी पहचान—तीनों को साथ रखने की चुनौती है।
चलो एक बार फिर से · कहानी के पात्रसुहानी
सुहानी धीर की बचपन की वह चुलबुली दोस्त है, जिसे देखकर हर कोई कहेगा—ज़िंदगी में सुहानी जैसी एक दोस्त तो होनी ही चाहिए।
वह धीर की ज़िंदगी में दोस्त से कहीं बढ़कर है—उसकी हँसी में शामिल, उसकी परेशानियों की साथी और उसके उन दिनों की गवाह, जब धीर ख़ुद भी नहीं जानता था कि वह ज़िंदगी से चाहता क्या है।
धीर की कहानी में सुहानी की मौजूदगी उस दोस्ती की याद दिलाती है, जो बिना किसी शर्त के साथ खड़ी रहती है।
चलो एक बार फिर से · कहानी के पात्रप्रज्ञा
प्रज्ञा धीर की बॉस है और उसी मध्यमवर्गीय परिवार से आती है, जहाँ लड़की को पढ़ाने का मक़सद अक्सर यही होता है कि उसकी शादी किसी अच्छे घर में हो सके।
लेकिन प्रज्ञा ने अपने लिए एक अलग रास्ता चुना।
शुरुआती झटकों और संघर्षों के बाद वह ख़ुद को इतना मज़बूत बनाती है कि एक दिन दुनिया उसकी बात सुनती है। वह फ़ेमिनिज़्म के नारे नहीं लगाती, बल्कि अपने फैसलों और अपने काम से अपनी जगह बनाती है।
प्रज्ञा उन लड़कियों की आवाज़ है, जो अपनी ज़िंदगी का रास्ता ख़ुद चुनती हैं।
चलो एक बार फिर से · कहानी के पात्रसूबेदार राकेश भार्गव
सूबेदार राकेश भार्गव धीर के पिता हैं, जिनका कोर्टमार्शल हो चुका है। वह अपने अधूरे सपने को बेटे के ज़रिए पूरा करना चाहते हैं और इसी चाहत में यह भूल जाते हैं कि धीर अपनी ज़िंदगी से क्या चाहता है।
बेटे का भविष्य सँवारने की कोशिश में उनकी सख़्ती धीरे-धीरे ऐसी दीवार खड़ी कर देती है, जिसके एक तरफ़ पिता है और दूसरी तरफ़ बेटा।
धीर के मन में पिता के लिए प्यार से कहीं ज़्यादा गुस्सा और शिकायत है। लेकिन बरसों से चली आ रही इस दूरी का अंत क्या कभी पिता और बेटे को एक-दूसरे के करीब ला पाएगा?
चलो एक बार फिर से · कहानी के पात्रकिताब में धीर की कहानी है।
यहाँ, आपकी भी जगह है।
कुछ अनकहा है? धीर से साझा करें। या लेखक से मिलने का समय माँगें।
